+Get Now!

प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

17 August 2017

हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे....

हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे
एक कहानी होती है
जिसे सुनकर हँसती दुनिया
या कभी कभी वह रोती है  ।

कोई कहता हँसता है वह
कोई कहता पागल है
ऐसी कैसी उसकी फितरत
भीतर से वह घायल है

मिल कर गले कोई नहीं
जो सुनकर मन की बातों को
अपने ढंग से देख समझ कर
दिखला दे नयी राहों को

जीवन की आपा-धापी में
एक धार बहानी होती है
हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे
एक कहानी होती है।


-यश ©
17/08/2017

15 August 2017

तिरंगे में पुते चेहरे दिखने लगे हैं

तिरंगे में पुते चेहरे दिखने लगे हैं 
तिरंगे फिजा में लहरने लगे हैं 
ये कुछ पल का नज़ारा है मानो न मानो 
फिर तो बस शाम को बुहरने लगे हैं 

करके सुबह सलाम,बस इतना सा करना
चूने की सड़कों पे संभल संभल के चलना 

न आए पैरों तले, न बेकद्री से बिखरे 
मेरा देश और ये झण्डा खूब खुशियों से निखरे 

-यश-©

आप सभी को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ !
खुद को सावधान रखें...तिरंगे का मान रखें !

10 August 2017

कुछ लोग -40

संपर्कहीन
बीते दौर के
कुछ लोग
जिनसे जुड़े होते हैं
हम
अपनी पूरी भावनाओं
और संवेगों के साथ,
संभाले होते हैं
जिनकी स्मृति
और कुछ
स्वर्णिम पल
इस उम्मीद में
कि फिर कभी
कहीं मिलेंगे
इसी जीवन में
किसी नदी के किनारे,
या सड़क पर
कहीं को जाते हुए
या आते हुए-
उनके नाम
जब टकराते हैं
बदले हुए चेहरों -
पर,
उन्हीं हाव-भावों
सहयोग और अपनेपन
के साथ,
तब ऐसा लगता है
जैसे
तेज़ भागते वक़्त को भी
होती है कद्र
कुछ लोगों के
भीतर के
एहसासों की।
.
-यश©

03 August 2017

मन की देहरी पर


मन की देहरी पर
मन की बातों को लेकर
मैं -जैसा हूँ
वैसा ही बने रह कर
बस कह देता हूँ
कुछ शब्द
जो कुछ भी नहीं हो कर
कहीं समा जाते हैं
कुछ पन्नों के भीतर ।

कुछ पन्ने
जो चिन्दियाँ बन कर
उड़ कर
गिरते जाते हैं
यहाँ-वहाँ
और न जाने
क्या-क्या कह कर
कोई सुनने वाला हो यहाँ
तो वो ही समझेगा
न जाने क्या क्या दफन है
मेरे मन की देहरी पर।

-यश©
03/08/2017

01 August 2017

एक कहानी ऐसी लिख दूँ


एक कहानी ऐसी लिख दूँ
जिसमें अपने मन की कह दूँ
काले यथार्थ की गहरी परतों पर
कल आज और कल को रच दूँ।

एक कहानी ऐसी लिख दूँ
जिससे जुड़ा हो बचपन सब का
परावर्तित हो भूत-भविष्य और
दिखे चलचित्र तब और अब का।

एक कहानी ऐसी लिख दूँ
जिसका अंत अनादि हो कर
जुड़ा हो सबके अपने आज से
कुछ कल्पना के रंग में घुल कर।

एक कहानी ऐसी लिख दूँ
जिसमें अपने मन की कह कर
शब्दों के मनकों से जुड़ लूँ
और हल्का खुद को थोड़ा कर लूँ।

एक कहानी ऐसी लिख दूँ।

-यश © 
01/08/2017

बहुत दिन पुराना यह अधूरा ड्राफ्ट आखिरकार आज पूरा हुआ :)

16 July 2017

कुछ लोग -39

बने रहो पगला
काम करेगा अगला की
तर्ज़ पर
'बैल बुद्दि' वाले
कुछ लोग
अपने प्रतिउत्तरों से
निरुत्तर करने की बजाय
खेल जाते हैं
उल्टे दांव।
ऐसे कुछ लोग
न जाने
किस सोच मे डूबे हुए
सिर्फ खुद को सही
और ज्ञाता मानते हुए
अपने पूर्वानुमानों को ही
सबसे सही बताते हुए
बस किसी तरह ही
रख पाते हैं काबू
अपने भीतर के शैतान को।
'बैल बुद्दि' वाले
कुछ लोग
मजबूर होते हैं
अपनी आदतों
और आनुवंशिकी
संस्कारों से
जिनको बदल पाना \
हो नहीं सकता
कभी भी
किसी भी तरह
संभव।
.
-यश©

14 July 2017

बी ए पास रिक्शे वाला


बी ए पास
वह रिक्शे वाला
मौसम की हर मार से
बे असर –बे खबर
हर समय रहता है तैयार
चलने को
तलवार की धार की तरह
पैनी तीखी
मेरे शहर की
सड़कों के साथ जाती
किसी की मंज़िल तक
पहुँचने को
या
पहुंचाने को।

वह
सवारियों के लिए
उठा लेता है
‘हुड’
धूप और
बरसात से बचने को
लेकिन खुद
पसीने से तर-बतर
चेहरे पर मुस्कान
और ज़ुबान पर
मीठी बात लिए
किसी कुशल
‘सेल्समैन’ की तरह
गड्ढेदार सड़कों के
प्रतिउत्तर का
अपने संयम और
उत्साह से 
सामना करते हुए
बस कामना करता है
अपने ‘उचित प्रतिफल’ की।

बी ए पास
वह रिक्शे वाला
कल मुझे मिला
और इच्छा करने लगा
कहीं  
एक अदद नौकरी की
सिफ़ारिश की....
मदद की
बिना उसका उत्तर दिये
बी ए पास ‘मैं’
बस अपने मौन में
यही सोचता रहा
कि मुझसे कहीं बेहतर
आत्मनिर्भर
बी ए पास
वह रिक्शे वाला
आखिर क्यों
बनना चाहता है
मेरी तरह
सूट-बूट
टाई और काले चश्मे वाला
एक (अ)सभ्य मजदूर। 

-यश©
14/07/2017

गधे चाहिए

उन्हें इंसान नहीं
कुछ गधे चाहिए
जो उनकी ही देखें -सुनें
अकल के अंधे चाहिए ।

कोशिश  तो की कई बार
कि हट जाए आँखों से पट्टी
उन्हें सिर्फ एक दिखता है
बाकियों मे खोट चाहिए ।

ये ज़माना और है
वो ज़माना और था
अब तो हर काम में
कोल्हू के बैल चाहिए ।

यश ©

01 July 2017

छोटू .....

रामू की
चाय की दुकान पर
कोल्हू का बैल बना
छोटू
इस गर्मी में
अंगीठी की आंच
खौलते दूध की भाप
और ग्राहकों की मांग
झेलता हुआ भी
बना रहता है
तरो -ताज़ा।

उसकी मुस्कुराहट
और
मक्खन की
टिक्की की तरह
मुलायम
उसकी बातें
बना देती हैं
रामू की दुकान को
और भी मशहूर
क्योंकि
छोटू के हाथ की चाय
समोसे
और बन-मक्खन
दूर  कर चुके हैं
उससे उसका बचपन।

-यश©
(वास्तविक और आँखों देखी पर आधारित)